
उत्तराखंड की पावन धरती पर अलकनंदा नदी के बीच एक चट्टान पर विराजमान हैं मां धारी देवी। कहा जाता है कि जब तक देवी अपनी जगह पर रहती हैं, तब तक पूरा गढ़वाल सुरक्षित रहता है।
लेकिन समय बदला… और प्रकृति ने अपना रौद्र रूप दिखाया।
🌧️ 2009 – पहली चेतावनी
साल 2009…
अलकनंदा नदी पर हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट का निर्माण शुरू हुआ। मशीनों की गड़गड़ाहट, पहाड़ों की कटाई और नदी के रास्ते में बदलाव होने लगे।
उसी साल:
- बारिश असामान्य रूप से बढ़ी
- भूस्खलन हुए
- नदी का बहाव उग्र हो गया
स्थानीय लोग कहने लगे —
“मां धारी देवी नाराज़ हैं… यह सिर्फ चेतावनी है।”
🌊 2013 – प्रलय का दिन
16 जून 2013…
वही दिन जब धारी देवी की मूर्ति को उसके मूल स्थान से हटाया गया, क्योंकि डैम का पानी मंदिर को डुबो सकता था।
और फिर…
आसमान फटा,
नदियां उफान पर आ गईं,
केदारनाथ से लेकर श्रीनगर तक सब कुछ बह गया।
- हजारों लोगों की जान चली गई
- गांव, सड़कें, मंदिर मिट्टी में मिल गए
- पूरा उत्तराखंड शोक में डूब गया
लोगों की आंखों में एक ही सवाल था—
👉 “क्या देवी का संरक्षण हट गया था?”
🕉️ देवी का रहस्य
कहा जाता है:
- धारी देवी की मूर्ति अधूरी है
- उनका स्वरूप दिन में बदलता है
- रात में कोई भी पुजारी मंदिर में नहीं रुकता
मान्यता है कि देवी चलायमान शक्ति हैं —
उन्हें हटाना, छेड़ना या अनदेखा करना
प्रकृति के नियमों को चुनौती देना है।
⚖️ आस्था या विज्ञान?
विज्ञान कहता है:
अत्यधिक वर्षा, ग्लेशियर पिघलना और डैम कारण थे।
आस्था कहती है:
देवी के अपमान का परिणाम था।
👉 सच शायद दोनों के बीच कहीं छिपा है।
📌 कहानी का संदेश
धारी देवी की कहानी हमें सिखाती है कि
प्रकृति, आस्था और परंपरा का संतुलन जरूरी है।
जब इंसान लालच में सीमाएं लांघता है,
तो प्रकृति स्वयं न्याय करती है।