सकट चौथ (Sakat Chauth) का इतिहास व महत्व

jjjjj

सकट चौथ को तिलकुटा चौथ, माघी चौथ और कई स्थानों पर वक्रतुंडी चौथ भी कहा जाता है। यह व्रत मुख्य रूप से माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। यह दिन भगवान श्री गणेश को समर्पित होता है।


📜 सकट चौथ का इतिहास

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक समय की बात है जब एक निर्धन महिला अपने पुत्र के साथ रहती थी। गरीबी के कारण वह अपने बच्चे को भरपेट भोजन नहीं करा पाती थी। एक दिन माघ महीने की चतुर्थी को उसने पूरे श्रद्धा भाव से भगवान गणेश का व्रत रखा। भगवान गणेश उसकी भक्ति से प्रसन्न हुए और उसके जीवन से सारे कष्ट दूर कर दिए। तभी से यह व्रत संतान की रक्षा, सुख-समृद्धि और संकटों से मुक्ति के लिए किया जाने लगा।

एक अन्य कथा के अनुसार, देवताओं और असुरों के युद्ध के समय भगवान गणेश ने अपने चतुर बुद्धि से देवताओं को संकट से बचाया। उसी दिन की स्मृति में इस चतुर्थी को सकट चौथ कहा गया, जहाँ “सकट” का अर्थ है संकट


🙏 धार्मिक महत्व

  • यह व्रत विशेष रूप से माताएँ अपनी संतान की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए करती हैं।
  • इस दिन भगवान गणेश की वक्रतुंडी रूप में पूजा की जाती है।
  • व्रत में तिल (तिलकुट), गुड़, मूंगफली और लड्डू का विशेष महत्व होता है।
  • चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य देने के बाद ही व्रत खोला जाता है।

🌕 पूजा विधि संक्षेप में

  1. प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें
  2. गणेश जी को दूर्वा, तिल, लड्डू अर्पित करें
  3. सकट चौथ की कथा सुनें
  4. रात्रि में चंद्र दर्शन कर अर्घ्य दें

निष्कर्ष

सकट चौथ केवल एक व्रत नहीं, बल्कि मातृत्व, आस्था और विश्वास का प्रतीक है। यह पर्व सिखाता है कि सच्ची श्रद्धा से भगवान गणेश सभी संकटों को दूर कर देते हैं।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *