
कहते हैं, हिमालय की बर्फीली चोटियों के पार, बादलों और रहस्य की चादर में लिपटा हुआ है — “शंभाला”, एक ऐसा लोक जहाँ समय ठहर जाता है, और इंसान अपनी आत्मा का असली स्वरूप जान पाता है।
बौद्ध ग्रंथों में इसे “शुद्ध भूमि” (Pure Land) कहा गया है — जहाँ सिर्फ वही पहुँच सकते हैं जिनका हृदय पवित्र और मन संतुलित हो।
🔮 कहानी की शुरुआत
सदियों पहले, एक तिब्बती साधु “लोसेन” तपस्या में लीन था। उसका लक्ष्य था — “शंभाला” की झलक पाना।
कहा जाता है, जिसने शंभाला देखा, उसने मुक्ति और अमरता दोनों को छू लिया।
एक रात, ध्यान में बैठे लोसेन के सामने एक प्रकाशमान व्यक्ति प्रकट हुआ — “कल्कि राजा”, जो शंभाला का रक्षक था।
उसने कहा —
“शंभाला कोई जगह नहीं, लोसेन। यह तुम्हारे मन का वह हिस्सा है, जहाँ न लालच है, न भय, सिर्फ शुद्ध ज्ञान है।”
पर लोसेन ने आग्रह किया, “मुझे उसे देखना है, अनुभव करना है।”
कल्कि मुस्कुराए, बोले —
“तो फिर हिमालय की सबसे ऊँची चोटी की ओर चलो, पर याद रखो — जो भय लाएगा, वह रास्ता कभी नहीं देखेगा।”
🕉️ रहस्य का द्वार
लोसेन ने वर्षों की यात्रा के बाद, एक गुफा में प्रवेश किया।
वहाँ दीवारों पर मंत्र खुदे थे जो प्रकाश छोड़ते थे।
हर मंत्र उसके अंदर के अंधेरे को मिटा रहा था।
अचानक, उसके सामने सोने की रोशनी का द्वार खुला।
उसने जब उस द्वार में प्रवेश किया —
तो उसने देखा, लोग बिना बोलचाल के संवाद कर रहे थे,
फूल बिना मिट्टी के खिल रहे थे,
और हवा से संगीत बह रहा था।
वह था — शंभाला।
🪶 वर्तमान में शंभाला
कहा जाता है, आज भी शंभाला के द्वार केवल उन्हीं के लिए खुलते हैं,
जो भीतर की यात्रा करने को तैयार हैं —
जो अपने अहंकार, भय और क्रोध को त्याग सके।
और कुछ योगियों का मानना है —
जब धरती पर अंधकार और अधर्म का चरम होगा,
तब शंभाला से एक कल्कि योद्धा निकलेगा,
जो पुनः सत्य और धर्म की स्थापना करेगा।
💫 संदेश
“शंभाला खोजने की ज़रूरत नहीं,
वो हर उस हृदय में है जहाँ प्रकाश बाकी है।”