
सन् 1675 में भारत में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब का शासन था। वह पूरे देश में जबरन धर्म परिवर्तन करवाना चाहता था। कई लोगों पर अत्याचार हो रहे थे, खासकर कश्मीर के कश्मीरी पंडितों पर।
कश्मीरी पंडितों ने यह अत्याचार रोकने के लिए एक महान आत्मा की मदद लेने का निर्णय किया। वे गुरु तेग बहादुर जी, जो नौवें सिख गुरु थे, के पास पहुँचे। उन्होंने उनसे अपनी दुखभरी कहानी सुनाई।
गुरु जी ने उनकी बात ध्यान से सुनी और बिना कोई डर दिखाए कहा:
“यदि किसी को धर्म की स्वतंत्रता नहीं मिल सकती, तो कोई भी स्वतंत्र नहीं है।”
यह बात सुनकर गुरु जी ने निर्णय लिया कि वे उन्हीं के लिए खड़े होंगे।
⚔️ दिल्ली की ओर यात्रा
गुरु जी स्वयं आगे बढ़े और अपने तीन प्रमुख साथियों—
भाई मतीदास, भाई सतीदास और भाई दयाला —के साथ दिल्ली की ओर चल पड़े।
औरंगज़ेब ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और कहा कि अगर वे इस्लाम धर्म स्वीकार कर लें तो उन्हें आज़ाद कर दिया जाएगा।
लेकिन गुरु तेग बहादुर जी ने स्पष्ट कहा:
“मैं किसी भी धर्म के खिलाफ नहीं हूँ। पर मैं किसी को अपना धर्म बदलने के लिए बाध्य नहीं कर सकता—और न ही खुद मजबूरी में धर्म बदलूँगा।”
🔥 साथियों की शहादत
गुरु जी के तीनों साथियों को बेहद क्रूर तरीकों से शहीद किया गया, पर किसी ने अपना धर्म नहीं छोड़ा।
फिर भी गुरु जी अडिग रहे—न डरे, न झुके।
🗡️ 24 नवंबर 1675 – शहादत का दिन
24 नवंबर को चांदनी चौक, दिल्ली में गुरु तेग बहादुर जी का सिर धड़ से अलग कर दिया गया।
उनकी शहादत ने पूरी दुनिया को यह संदेश दिया कि:
“धर्म की रक्षा केवल अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए भी की जानी चाहिए।”
उनका बलिदान सिर्फ सिखों के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए था।
🌟 क्यों मनाया जाता है Shaheedi Diwas?
- धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए
- सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा के लिए
- साहस, त्याग और मानवता के सम्मान में
गुरु तेग बहादुर जी को आज भी Hind Di Chadar (हिंद की चादर) कहा जाता है — क्योंकि उन्होंने पूरे देश की रक्षा के लिए अपने प्राण त्याग दिए।