नाम और स्थान

- यह पर्व किन्नौर जिले में मनाया जाता है।
- नाम की वर्तनी कभी-कभी “Raulane”, “Raulānē” या “Rulane” भी देखी जाती है।
उत्सव की उम्र
- स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह त्योहार लगभग 5,000 साल पुराना है।
- इससे यह किन्नौर की पुरातन सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का हिस्सा माना जाता है।
मूल कहानी और विश्वास
- रौलाने त्योहार “सौनी” (Sauni) नामक दिव्य परियों (spirits / fairies) को समर्पित है।
- स्थानीय मान्यता है कि ये सौनी सर्दियों के कठिन दिनों में पहाड़ियों में दूरी और ठंड से लोगों की रक्षा करती हैं।
- त्योहार का एक उद्देश्य इन सौनी आत्माओं का सम्मान करना और उनकी सुरक्षा, मार्गदर्शन की आशीर्वाद मांगना है।
रिसर्च और आध्यात्मिक अनुष्ठान
- उत्सव में दो पुरुषों को ‘Raula’ (दूल्हा) और ‘Raulane’ (दुल्हन) की भूमिका दी जाती है, हालांकि दोनों पुरुष ही होते हैं।
- वे पूरी तरह पारंपरिक के वस्त्र, भारी ऊनी कपड़े, मुखौटे, और आभूषण पहनते हैं ताकि उनका चेहरा छिपा रहे।
- यह प्रतीकात्मक “विवाह” मानव और दिव्य (परियों) के बीच एक पवित्र संबंध दर्शाता है।
- इसके बाद, वे नर्तन करते हैं (धीरे, धार्मिक नृत्य) — कहा जाता है कि इनमें उनकी आत्माएँ सौनी आत्माओं की तरह उतरती हैं।
- स्थान के अनुसार, यह समारोह नगीन नारायण मंदिर (Nagin Narayan Temple) जैसे पवित्र स्थानों पर हो सकता है।
समय और तिथि
- संस्कृति और सामुदायिक महत्व
- यह त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं है, बल्कि सामुदायिक एकता का प्रतीक भी है — गांव के लोग मिलकर तैयारी करते हैं, उत्सव में भाग लेते हैं, और यह उनकी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाता है।
- यह प्रकृति, मिट्टी, कृषि और पर्वतीय जीवन के साथ गहरे जुड़ाव को दर्शाता है।
- चेहरे को छिपाने और भारी वेशभूषा का इस्तेमाल, शायद यह दर्शाता है कि “मानव” और “दैवीय” सीमाएँ इस त्योहार में धुंधली हो जाती हैं, और भूमिका निभाने वाले व्यक्ति सिर्फ इंसान नहीं, बल्कि एक माध्यम बन जाते हैं।
“Kinnaur का Rolane Festival सच में हिमाचल की अनोखी और रहस्यमयी परंपराओं को दिखाता है। 5,000 साल पुरानी मान्यताओं, सौनी आत्माओं और पारंपरिक वेशभूषा के बारे में जानकर बहुत अच्छा लगा। ऐसी लोक परंपराएँ हमारी संस्कृति को और भी खास बनाती हैं।”