कचड़ू देवता (Kachdu Devta) – Uttarkashi Uttarakhand

देवभूमि उत्तराखंड में हिंदू धर्म के प्रमुख देवताओं के साथ-साथ स्थानीय लोक देवीदेवताओं की पूजा की परंपरा भी अत्यंत प्राचीन है। पहाड़ों में रहने वाले कई ऐसे महापुरुष हुए, जिन्होंने अपने जीवन में अच्छे और लोककल्याण के कार्य किए और बाद में लोक-आस्था के कारण देवत्व को प्राप्त हुए। उनकी स्मृति में आज भी उनकी पूजा की जाती है।

कुछ देवता ऐसे भी हैं जिन्हें प्रारंभ में अनिष्ट के भय से पूजना शुरू किया गया और समय के साथ-साथ वे पूरे समाज के लोक देवता बन गए। उत्तराखंड के हर क्षेत्र में अपने-अपने लोक देवता हैं। इन्हीं में से एक प्रसिद्ध लोक देवता हैं कचड़ू देवता, जो उत्तरकाशी जनपद के डूंडा क्षेत्र के धनारी और बरसाली गाँव के आराध्य देव माने जाते हैं। डूंडा ब्लॉक के रानाड़ी गाँव में भी उनका प्राचीन मंदिर स्थित है।

 

 

कचड़ू देवता की कथा

लोककथाओं के अनुसार,150 साल पहले उत्तरकाशी के डूंडा जागीर में एक युवा जागीरदार रहते थे, जिनका नाम कचड़ू राणा था।कचड़ू को डुंडा की जागीर दी गई थी । उनकी बहन शोभना का ससुराल बरसाली गाँव में था। कचड़ू राणा अपनी वृद्ध माँ के साथ रहते थे।

एक बार दीपावली के दिन कचड़ू राणा अपनी बहन से मिलने बरसाली गाँव के लिए जाता है। रास्ते में थकान होने पर वे एक पेड़ के नीचे बैठ गए और मधुर स्वर में अपनी मुरली बजाने लगे। उनकी मुरली की धुन से आकर्षित होकर आंछरियाँ (परियाँ) वहाँ आ पहुँचीं और कचड़ू को अपने साथ ले गईं और उसको अपने वश में कर देती हैं।

परियों के साथ रहते हुए कचड़ू राणा अपनी माँ की चिंता करने लगे। उन्होंने परियों से निवेदन किया कि उनकी वृद्ध माँ घर में अकेली है और बिना सहायता के काम नहीं कर पाएगी। कचड़ू की व्यथा सुनकर परियों को उस पर दया आ गई। उन्होंने कहा कि वे उसे छोड़ तो नहीं सकतीं, लेकिन एक विशेष सिद्धि अवश्य प्रदान कर सकती हैं।

शर्त यह थी कि कचड़ू रात के समय इस सिद्धि के प्रभाव से घर जाकर माँ के सभी काम कर सकेगा, लेकिन दिन में उसे परियों के पास लौटना होगा। लेकिन अगर वह कभी मां की नजरों में आ गया तो वह शक्ति वापस हो जाएगी, तो उसकी सारी सिद्धि समाप्त हो जाएगी।

कचड़ू ने यह शर्त स्वीकार कर ली। स्वप्न के माध्यम से उसने अपनी माँ को सारी बात बता दी और हर रात चुपचाप घर आकर उसके सभी काम पूरे करने लगा। माँ सब जानती थी, लेकिन चुपचाप सोई रहती थी।

एक दिन मातृत्व भाव उस पर हावी हो गया। उसने निश्चय किया कि चाहे जो हो, आज वह अपने बेटे को देखेगी। रात में वह छिपकर बैठ गई। जैसे ही कचड़ू घर में काम करने आया, माँ ने उसे देख लिया और भावुक होकर उसको पकड़ लिया।

तभी कचड़ू के मुख से निकला—

हे माँतुमने यह क्या कर दिया। अब मैं तुम्हारी सेवा नहीं कर पाऊँगालेकिन देव बनकर लोगों की सहायता अवश्य करूँगा।

इतना कहकर कचड़ू वहाँ से अदृश्य हो गया और माना जाता है कि उसने देवत्व प्राप्त कर लिया। तभी से वे कचड़ू देवता के रूप में पूजे जाते हैं और आज भी श्रद्धालुओं की रक्षा और सहायता करते हैं।

FAQ

Q1. कचड़ू देवता कौन हैं ?

उत्तर: कचड़ू देवता उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के डूंडा क्षेत्र के प्रसिद्ध लोक देवता हैं, जिन्हें धनारी,  बरसाली और रानाड़ी गाँवों में पूजा जाता है।

Q2. कचड़ू देवता उत्तरकाशी में कहाँ स्थित हैं ?

उत्तर: कचड़ू देवता का प्राचीन मंदिर उत्तरकाशी जिले के डूंडा ब्लॉक के रानाड़ी गाँव में स्थित है।

Q3. कचड़ू देवता की कथा क्या है ?

उत्तर: लोककथा के अनुसार कचड़ू राणा परियों की सिद्धि से रात में अपनी माँ की सेवा करते थे। माँ द्वारा देख लिए जाने पर सिद्धि समाप्त हुई और उन्होंने देवत्व प्राप्त किया।

Q4. कचड़ू देवता का असली नाम क्या था ?

उत्तर: कचड़ू देवता का वास्तविक नाम कचड़ू राणा था, जो डूंडा जागीर के जागीरदार थे।

Leave a Reply