उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल में जौनसार-बावर क्षेत्र अपनी अनोखी आस्थाओं के लिए प्रसिद्ध है। यहां कई बकरियां खुली घूमती दिखाई देती हैं। इन्हें कोई छूता तक नहीं। यदि वे फसल खा लें, तब भी उन्हें रोकना पाप माना जाता है।

दरअसल, ये बकरियां महासू देवता को अर्पित होती हैं। इसलिए पूरा गांव उनकी सेवा को धर्म समझता है।

यद्यपि इस क्षेत्र में कभी पशु बलि की परंपरा रही, फिर भी इन अर्पित बकरियों को पूर्ण संरक्षण प्राप्त है। यही आस्था उत्तराखंड से आगे हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों तक फैली हुई है।

महासू देवता केवल स्थानीय देवता नहीं हैं। बल्कि वे न्याय, शक्ति और लोकविश्वास का अद्भुत संगम माने जाते हैं।


महासू देवता कौन हैं?

महासू देवता एक नहीं, बल्कि चार भाई माने जाते हैं:

  1. बासिक महासू
  2. पवास (प्रवासी) महासू
  3. बठिया (भठिया) महासू
  4. चालता महासू

आमतौर पर इन्हें भगवान शिव का रूप माना जाता है। कई लोग इन्हें “महाशिव” का अपभ्रंश मानते हैं। वहीं एक मत के अनुसार “महा + शु” (किरात भाषा में शु = देवता) से मिलकर “महासू” शब्द बना, जिसका अर्थ है “महान देवता”।

कुछ विद्वान इन्हें नाग देवताओं से जोड़ते हैं, तो कुछ एक न्यायप्रिय ऐतिहासिक शासक के रूप में भी देखते हैं।


हनोल: महासू देवता का प्रमुख धाम

टोंस नदी के बाएं तट पर स्थित हनोल मंदिर महासू देवता का सबसे प्राचीन और पौराणिक मंदिर माना जाता है। हनोल को महासू परिवार का संयुक्त स्थान कहा जाता है। यहां मुख्य रूप से बठिया महासू की पूजा होती है। वर्षों से इसे उत्तराखंड का “पांचवां धाम” घोषित करने की मांग उठती रही है। हनोल के आसपास जौनसार-भावर और रवाई क्षेत्र में भी महासू के अनेक थान (मंदिर) स्थित हैं।


मेंद्र: उत्पत्ति से जुड़ा पवित्र स्थल

हनोल से लगभग 10 किमी दूर स्थित मेंद्र गांव महासू देवता की उत्पत्ति कथा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां बासिक महासू और उनकी माता धर्म कला (देवलाली) का पूजा स्थल है।


चालता महासू: हमेशा प्रवास पर रहने वाले देवता

चार भाइयों में सबसे रहस्यमयी हैं चालता महासू। इनका कोई स्थायी मंदिर नहीं है।

प्रवास व्यवस्था

ब्रिटिश काल में इनके प्रवास को दो भागों में बांटा गया:

  • साठी क्षेत्र – जौनसार-भावर और आंशिक हिमालय क्षेत्र
  • पासी क्षेत्र – उत्तरकाशी और हिमाचल का कुछ भाग

चालता महासू 12 वर्ष एक दिशा में और 12 वर्ष दूसरी दिशा में प्रवास करते हैं।
24 वर्षों में एक पूरा चक्र पूरा होता है।

जब एक प्रवास समाप्त होता है, तो एक रात के लिए वे हनोल अवश्य रुकते हैं और अगली सुबह नई दिशा में यात्रा आरंभ करते हैं।

 

गांवों में प्रवास

उनकी पालकी को स्थानीय क्षेत्रीय प्रतिनिधि (वजीर) लेकर चलते हैं। एक गांव में आमतौर पर एक वर्ष तक ठहराव होता है।

कई क्षेत्रों में दशकों बाद चालता महासू के दर्शन होते हैं। कुछ जगहों पर तो पीढ़ियां प्रतीक्षा करती हैं। जब वे गांव छोड़ते हैं, ग्रामीण भावुक होकर रो पड़ते हैं।


महासू देवता के वीर

महासू देवता के साथ उनके वीर (गण) भी माने जाते हैं:

  • बठिया महासू – कैलू वीर
  • बासिक महासू – कपला वीर
  • पवास महासू – कैलाथ वीर
  • चालता महासू – शेर कुड़िया वीर

इन वीरों की उत्पत्ति भी शिव-पार्वती की कथा से जुड़ी मानी जाती है।


उत्पत्ति की प्रमुख कथाएं

 

1. कार्तिकेय और मांसखंड कथा

एक हवन के दौरान कार्तिकेय और गणेश के बीच विवाद हुआ। क्रोधित होकर कार्तिकेय ने अपने शरीर के मांस के चार टुकड़े कर दिए।

शिव ने उन्हें समुद्र में फेंक दिया। उन्हें नागों — उलल नाग, लल नाग, वासुकी नाग और माडवा नाग — ने ग्रहण किया। उनसे चार नाग राजकुमार उत्पन्न हुए, जिन्हें बाद में महासू कहा गया। इसी कारण महासू को नाग देवता भी माना जाता है।


2. नाग और कृषक की कथा

एक किसान खेत जोत रहा था। अचानक नाग प्रकट हुआ और उसे वहां देव प्रतिमा स्थापित कर पूजा करने का निर्देश दिया।

नाग ने बकरी की बलि देने को भी कहा। संभवतः इसी कारण आज भी महासू को बकरों का दान दिया जाता है।


3. हुना भाट और कश्मीर की गाथा (सबसे प्रसिद्ध)

मेंद्र गांव में हुना भाट नामक ब्राह्मण रहता था। किमर नामक राक्षस ने उसके छह पुत्रों की बलि ले ली थी। सातवें पुत्र को बचाने के लिए हुना भाट की पत्नी कलावती ने एक तालाब पर पानी भरते समय शेर कुड़िया वीर की आवाज सुनी।

वीर ने सलाह दी — कश्मीर जाओ, वहां चार महासू निवास करते हैं। हुना भाट कश्मीर पहुंचा। उसे निर्देश मिला कि तालाब से निकलते समय जो पालकी बाईं ओर मुड़े, उसे पकड़ लेना — वही चालता महासू होंगे।

हुना भाट ने वैसा ही किया। चारों महासू मेंद्र आने को तैयार हुए। उन्हें क्षेत्र में प्रकट करने हेतु चांदी की रस्सी वाले हल से खेत जोतने को कहा गया। लेकिन सात दिन की प्रतीक्षा से पहले ही छठे दिन हल चला दिया गया।

परिणामस्वरूप:

  • बासिक महासू की आंख घायल हुई
  • पवास महासू के कान में चोट आई
  • बठिया महासू के घुटने में चोट लगी
  • चालता महासू सुरक्षित रहे

इसी कारण कुछ मूर्तियों में खंडित रूप दिखाई देता है। चारों ने राक्षस किमर और अन्य दुष्ट शक्तियों का नाश किया और क्षेत्र में स्थापित हो गए।


क्षेत्र विभाजन

  • माता देवलाली – मेंद्र
  • बठिया महासू – हनोल
  • बासिक – बावर क्षेत्र
  • पवास – देवदार क्षेत्र
  • चालता – प्रवास पर

क्योंकि उनके लिए स्थायी स्थान नहीं बचा, इसलिए वे सदैव प्रवास पर रहते हैं।


महासू: शिव या ऐतिहासिक शासक?

कुछ विद्वान तर्क देते हैं कि यदि महासू शिव होते तो मंदिरों में नंदी अवश्य होते, जबकि ऐसा नहीं है। एक ऐतिहासिक दृष्टिकोण यह भी है कि मुस्लिम आक्रमणों के समय किसी न्यायप्रिय राजा या सैन्य शक्ति ने क्षेत्र की रक्षा की, जिसे बाद में देवत्व प्रदान किया गया।

माना जाता है कि यमुना घाटी से लेकर सिरमौर, शिमला और सोलन तक उनकी सत्ता रही। भूमि विवादों और सामाजिक मामलों में लोग आज भी हनोल में देवता की शरण लेते हैं। इसी कारण महासू को न्याय का देवता कहा जाता है।


राष्ट्रपति भवन से नमक आने की परंपरा

लोककथा के अनुसार महासू देवता का डोरिया (प्रतीक चिन्ह) टोंस नदी में बहकर दिल्ली पहुंच गया। राजा ने उसे पहचान न पाने के कारण नमक रखने के लिए उपयोग किया। इसके बाद राजमहल में अनहोनी होने लगी। पुरोहितों ने इसे देवता का अपमान बताया।
राजा ने क्षमा मांगकर हर वर्ष नमक भेंट भेजने की परंपरा शुरू की। मान्यता है कि आज भी राष्ट्रपति भवन से हनोल धाम में नमक भेंट भेजा जाता है।


 

महासू देवता की गाथा केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि जौनसार-बावर की सामाजिक, सांस्कृतिक और न्यायिक व्यवस्था का आधार है।

यहां आस्था और प्रशासन, लोककथा और इतिहास, शिव और नाग परंपरा — सब एक साथ मिलते हैं।

महासू देवता आज भी लोगों के लिए:

  • न्याय के प्रतीक हैं
  • क्षेत्रीय एकता के केंद्र हैं
  • और लोकविश्वास की जीवित धरोहर हैं

जौनसार-बावर की पहचान महासू देवता के बिना अधूरी है।

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